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पौध संख्या व दूरी: फसल में प्रति हेक्टेयर 4 से 4.5 लाख पौधों की संख्या बनाए रखें। कम फैलने वाली किस्मों (जैसे JS 93-05, JS 95-60) के लिए कतार से कतार की दूरी 40 सेमी तथा अधिक फैलने वाली किस्मों (जैसे JS 335, NRC 7, JS 97-52) के लिए 45 सेमी दूरी रखें।
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यांत्रिक खरपतवार नियंत्रण: बोवाई के बाद फसल को 30 से 45 दिनों तक खरपतवार मुक्त रखें। इसके लिए खेत में समय पर डोरा/कुलपा चलाएं।
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रासायनिक खरपतवार नियंत्रण:
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बोवाई से तुरंत बाद (PPI/PI): पेन्डीमिथालीन 3.25 लीटर/हे., मेटालोक्लोर 2.00 लीटर/हे., क्लोमाझोन 2.00 लीटर/हे. या डाइक्लोसुलम 26 ग्राम/हे. की दर से छिड़कें।
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10-15 दिन की फसल पर: क्लोरीम्यूरान इथाइल 36 ग्राम/हेक्टेयर।
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15-20 दिन की फसल पर: इमेजाथायपर 1.00 लीटर/हे., क्विजालोफाप इथाइल 1.00 लीटर/हे. या फेनाक्सीफाप-पी-इथाइल 0.75 लीटर/हेक्टेयर का प्रयोग करें।
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संतुलित मात्रा: मृदा परीक्षण के आधार पर 20:60-80:40:20 (नत्रजन: स्फुर: पोटाश: सल्फर) कि.ग्रा./हे. का अनुपात अपनाएं।
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कार्बनिक खाद: प्रति हेक्टेयर 10-20 टन गोबर की खाद/नाडेप या 5 टन वर्मीकम्पोस्ट अंतिम जुताई के समय मिलाएं।
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टॉप-ड्रेसिंग (यूरिया): नत्रजन की पूर्ति हेतु आवश्यकतानुसार 50 किलोग्राम यूरिया का उपयोग अंकुरण के 7 दिन पश्चात डोरा चलाने के साथ करें।
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सूक्ष्म पोषक तत्व (जिंक एवं सल्फर):
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जिंक सल्फेट 25 कि.ग्रा./हे. की दर से डालें।
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सल्फर की पूर्ति के लिए सिंगल सुपर फास्फेट (400-500 कि.ग्रा./हे.) अथवा जिप्सम 200 से 250 कि.ग्रा./हे. की दर से छिड़कें।
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मैग्नीशियम (Magnesium – Magneez) की कमी के लक्षण:
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पुरानी (निचली) पत्तियों में शिराओं (veins) के बीच का हिस्सा पीला पड़ने लगता है, जबकि शिराएं हरी रहती हैं।
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पत्तियां धीरे-धीरे लाल-बैंगनी या भूरी होकर सूखने लगती हैं।
लोहा (Iron – Loha) की कमी के लक्षण:
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नई (ऊपरी) पत्तियों में इंटरवीनिल क्लोरोसिस (intervenal chlorosis) होता है—यानी पत्ती की मुख्य शिराएं हरी रहती हैं लेकिन बीच का भाग पीला/सफेद हो जाता है।
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अधिक कमी होने पर पूरी नई पत्ती सफेद/पीली पड़ जाती है और फसल की वृद्धि रुक जाती है।
पोटाश (Potassium – Potash) की कमी के लक्षण:
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पुरानी (निचली) पत्तियों के किनारे (margins) और सिरे पीले होकर जलने (burn/scorch) जैसे दिखाई देते हैं।
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पत्तियों के किनारे मुड़ने लगते हैं, तना कमजोर हो जाता है और पौधों में रोगों व सूखे से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है।
सल्फर (Sulfur – Salfar) की कमी के लक्षण:
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नई (ऊपरी) पत्तियां हल्की पीली या हल्के हरे रंग की हो जाती हैं (लोहे की कमी से अलग, इसमें शिराएं भी पीली पड़ती हैं)।
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पौधों का विकास धीमा पड़ जाता है, तना पतला और कड़ा हो जाता है तथा दानों/फलियों में प्रोटीन और तेल की मात्रा प्रभावित होती है।
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जल निकासी व जल संरक्षण: साधारण सीड ड्रिल से बुवाई के समय प्रत्येक 5-6 कतारों के बाद एक कूंड (नाली) बनाएं। डोरा चलाते समय इस कूंड को गहरा कर दें, जिससे अतिवृष्टि में जल निकासी आसान हो और कम वर्षा की स्थिति में नमी का संरक्षण हो सके।
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सिंचाई की क्रांतिक अवस्थाएं: फसल में फूल आने तथा फलियों में दाना भरते समय सूखे की स्थिति न बनने दें।
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जैविक एवं यांत्रिक नियंत्रण:
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पक्षियों के बैठने के लिए खेत में 20-25 ‘T’ आकार की खूंटियां प्रति हेक्टेयर लगाएं।
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कीट निगरानी के लिए 10-12 फेरोमोन ट्रैप एवं लाइट ट्रैप का उपयोग करें।
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रासायनिक नियंत्रण:
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ब्लू बीटल: क्लोरपायरीफास या क्यूनालफास 1.5 लीटर/हेक्टेयर।
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गर्डल बीटल (चक्र भृंग): ट्राईजोफास 0.8 लीटर/हेक्टेयर।
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पक्वता के लक्षण: फसल किस्म के अनुसार 80 से 110 दिनों में पककर तैयार होती है। फलियों का रंग बदलने और पत्तियां पीली होकर झड़ने पर फसल की कटाई करें।
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बीज भंडारण: गहाई के बाद दानों को अच्छी तरह सुखाकर ही सुरक्षित स्थान पर भंडारित करें।





