धान की खेती कैसे करे धान की खेती की संपूर्ण जानकारी

धान की फसल में महावार महत्वपूर्ण कार्य बिन्दु – नर्सरी डालना :

मई

१ पंत-४ सरजू-५२ आई.आर.-३६ नरेन्द्र ३५९ आदि।
२ धान के बीज शोधन बीज को १२ घन्टे पानी मे भिगोकर तथा सुखाकर नर्सरी में बोना।

जून

१ धान की नर्सरी डालना। सुगन्धित प्रजातियां शीघ्र पकने वाली।
२ नर्सरी में खैरा रोग लगने पर जिंक सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव सफेदा रोग हेतु फेरस सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव
३ धान की रोपाई
४ रोपाई के समय संस्तुत उर्वरक का प्रयोग एवं रोपाई के एक सप्ताह के अंदर ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण

 जुलाई 

१ धान की रोपाई प्रत्येक वर्गमीटर मे ५० हिल तथा प्रत्येक हिल पर २-३ पौधे लगाना एवं ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण
२ ऊसर क्षेत्र हेतु ऊसर धान-१ जया साकेत-४ की रोपाई ३५-४० दिन की पौध लगाना। पंक्ति से पंक्ति की दूरी १५ सेमी व पौधे से पौधे की दूरी १० सेमी. एवं एक स्थान पर ४-५ पौध लगाना।

अगस्त 

१ धान में खैरा रोग नियंत्रण हेतु ५ किग्रा. जिंक सल्फेट तथा २० किग्रा. यूरिया अथवा २.५ किग्रा. बुझा चूना को ८०० लीटर पानी।
२ धान में फुदका की रोकथाम हेतु मोनोक्रोटोफास ३५ ई.सी. एक ली. अथवा इंडोसल्फान ३५ ई.सी. १.५ लीटर ८०० लीटर घोलकर प्रति हे. द्दिडकाव।

 सितम्बार 

१ धान में फूल खिलने पर सिंचाई
२ धान में दुग्धावस्था में सिचाई।
३ धान में भूरा एवं झौका रोग की रोकथाम हेतु जिंक मैगनीज कार्बामेंट अथवा जीरम ८० के २ किग्रा. अथवा जीरम २७ प्रतिशत के ३० ली० अथवा कार्बन्डाजिम १ ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोलकर तैयार कर द्दिडकाव करना चाहिये।
४ धान में पत्तियों एवं पौधो के फुदके नियंत्रण हेतु मोनोक्रोटोफास १ लीटर का ८०० लीटर पानी में घोलकर प्रति हे. द्दिडकाव करे।
५ धान मे लेग लीफ अवस्था पर नत्रजन की टाप डे्रसिंग।
६ गन्धी कीट नियंत्रण हेतु ५ प्रतिशत में मैलाथियान चूर्ण २५ से ३० किग्रा. प्रति हे. की या लिन्डेन १.३ प्रतिशत धूल २० से २५ किग्रा./हे. का बुरकाव करे।

अक्टूबर

१ धान में सैनिक कीट नियंत्रण हेतु मिथाइल पैराथियान २ प्रतिशत चूर्ण अथवा फेन्थोएट का २ प्रतिशत चूर्ण २५-३० किग्रा. किग्रा/हे. बुरकाव करे।
२ धान में गंधी कीट नियंत्रण हेतु मैलाथियान ५ प्रतिशत चूर्ण के २५-३० कि. ग्रा. प्रति हे. या लिन्डेन १.३ प्रतिशत धूल धूल २०-२५ किग्रा. प्रति हे. बुरकाव करे।

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 खरीफ फसलो में धान प्रदेश की प्रमुख फसल है।  प्रदेश में गत ५ वर्षो में धान के अन्तर्गत क्ष॓त्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता के आकड़ो को यदि हम देखे तो यह पाते है की प्रदेश में चावल की औसत उपज में वृद्धि हो रही  है और अन्य प्रदेशो की तुलना में बहुत कम है इसकी  उत्पादकता बढ़ाने की काफी संभावना है। यह तभी सम्भव हो सकता है जब सघन विधियों को ठीक प्रकार से अपनाया जाय। धान की अधिक पैदावार प्राप्त करने हेतु निम्न बातो पर ध्यान देना आवश्यक है।

  1. स्थानीय परिस्थितियों जैसे क्ष॓त्रीय जलवायु, मिट्टी, सिचाई साधन, जल भराव तथा बुवाई एवं रोपाई की अनुकूलता के अनुसार ही धान की संस्तुत प्रजातियों का चयन करना चाहिए।
  2. शुद्ध प्रमाणित एवं शोधित बीज बोना चाहिए।
  3. मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरको, हरी खाद एवं जैविक खाद का समय से एवं संस्तुत मात्रा में प्रयोग  करना चाहिए।
  4. उपलब्ध सिंचन क्षमता का पूरा उपयोग कर समय से बुवाई/ रोपाई करें
  5. पौधो की संख्या प्रति इकाई सुनिश्चित की जाय।
  6. कीट रोग एवं खरपतवार नियंत्रण किया जाय।

उत्तर प्रदेश के विभिन्न जलवायु, क्षेत्रों, दशा परिस्थितियों के लिए धान की उन्नतशील प्रजातियाँ 

१. भावर एवं तराई क्ष॓त्र (सहारनपुर, बिजनौर, रामपुर, मुरादाबाद, पीलीभीत, बरेली, लखीमपुर)

(अ) असिंचित दशा 
शीघ्र पकने वाली 
(क) सीधी बुवाई :गोविन्द,  नरेंद्र-११८, नरेंद्र-९७ 
(ख) रोपाई : गोविन्द, नरेंद्र-८०
(ब) सिंचित दशा 
शीघ्र पकने वाली (१००-१२० दिन): रतना, गोविन्द,
मध्यम अवधि में पकने वाली (१२० -१४० दिन): पन्त धान-१०, पन्त धान-४, सरजू -५२, नरेंद्र- ३५९, पूसा-४४
देर से पकने वाली (१४० दिन से अधिक): एनडीआर -८००२
(स) सुगन्धित धान:  टा-३, पूसा बासमती -१, हरियाणा बासमती -१, पूसा सुगंध-४,५ 
(द) ऊसरीली: साकेत-४, झोना-349, ऊसर धान-१, नरेन्द्र ऊसर धान -२, सी.एस. आर.-10
(य) निचले जल भराव वाले क्षेत्र: ३० सेमी- मंसूरी

२. पश्चिम मैदानी क्षेत्र: (गंगा, जमुना दोआब के जनपद, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, बुलन्दशहर, बागपत, गौतमबुद्घनगर)

(अ) असिंचित दशा 
शीघ्र पकने वाली 
(क) सीधी बुवाई : गोविन्द, नरेंद्र-११८, नरेंद्र-९७ 
(ख) रोपाई : गोविन्द, नरेंद्र-८०
(ब) सिंचित दशा:  
शीघ्र पकने वाली (१००-१२० दिन): रत्ना, गोविन्द, मनहर, नरेन्द्र-८०, पन्त धान-12
मध्यम अवधि में पकने वाली (१२० -१४० दिन): पन्त धान-१०, पन्त धान-४, सरयू -५२, पूसा- ४४
देर से पकने वाली (१४० दिन से अधिक): एन. डी. आर. ८००२, टा-२३
(स) सुगन्धित धान:  टा-३, पूसा बासमती -१, हरियाणा- बासमती -१, तरावडी बासमती, बासमती-१
(द) ऊसरीली: साकेत-४, ऊसर धान-१, नरेन्द्र ऊसर धान -२, सी.एस. आर.-10
(य) निचले जल भराव वाले क्षेत्र: ३० सेमी- मंसूरी

 . मध्य पश्चिमी मैदानी क्षेत्र (बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर बरेली, पीलीभीत शाहजहांपुर, बदायूं ज्योतिबाफूले  नगर)

(अ) असिंचित दशा: 
शीघ्र पकने वाली
(क) सीधी बुवाई तथा रोपाई : गोविन्द
(ब) सिंचित दशा:  
शीघ्र पकने वाली (१००-१२० दिन) रत्ना, गोविन्द, मनहर, नरेन्द्र-८०, पन्त धान-12
मध्यम अवधि में पकने वाली (१२० -१४० दिन) पन्त धान-१०, पन्त धान-४, सरजू-५२, नरेन्द्र-३५९, पूसा-४४
(स) सुगन्धित धान:  टा-३ बासमती-३७०, पूसा बासमती-१, हरियाणा-बासमती-1
(द) ऊसरीली: ऊसर धान-१, नरेन्द्र ऊसर धान -२, सी.एस. आर.-10
(य) निचले जल भराव वाले क्षेत्र: ३० सेमी- मंसूरी

 ४.दक्षिण पश्चिमी अर्द्धशुष्क क्षेत्र (आगरा मंडल के समस्त जनपद)

(अ) असिंचित दशा 
शीघ्र पकने वाली 
(क) सीधी बुवाई : गोविन्द
(ख) रोपाई : गोविन्द, अश्वनी
(ब) सिंचित दशा  
शीघ्र पकने वाली (१००-१२० दिन) रत्ना, गोविन्द, मनहर, नरेन्द्र-८०, पन्त धान-१२, आई. आर-५०
मध्यम अवधि में पकने वाली (१२० -१४० दिन) क्रांति, पन्त धान-४, पन्त धान-१० सरजू-५२
देर से पकने वाली (१४० दिन से अधिक): पूसा-४४
(स) सुगन्धित धान:   टा-३ बासमती-३७०, पूसा बासमती-१
(द) ऊसरीली: ऊसर धान-१, नरेन्द्र ऊसर धान -२, सी.एस. आर.-10

 . मध्य मैदानी क्षेत्र ( लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद मण्डल प्रतापगढ़ को छोड़कर)

(अ) असिंचित दशा 
शीघ्र पकने वाली 
(क) सीधी बुवाई : गोविन्द, नरेन्द्र-११८, नरेन्द्र-९७
(ख) रोपाई :अश्वनी
(ब) सिंचित दशा  
शीघ्र पकने वाली (१००-१२० दिन) रत्ना, गोविन्द, मनहर, नरेन्द्र-८०, पन्त धान-१२, आई. आर-५०, अश्वनी, साकेत-४
मध्यम अवधि में पकने वाली (१२० -१४० दिन) सरजू-५२, संभा मंसूरी, स्वर्णा, सीता, पन्त धान-४, पन्तधान-१०, नरेन्द्र-३६९, क्रांति  
देर से पकने वाली (१४० दिन से अधिक): टा-२३, संभा मंसूरी, एम. टी. यू.-१००१, स्वर्णा
(स) सुगन्धित धान:  टा-३, पूसा बासमती-१, पूसा सुगन्धित-४,५
(द) ऊसरीली: सी. एस. आर.-१३ उसर धान-१, नरेन्द्र ऊसर धान-२, सी.एस.आर.- १०

 . बुन्देलखण्ड क्षेत्र (झाँसी एवं चित्रकूट धाम मण्डल)

(अ) असिंचित दशा
शीघ्र पकने वाली 
(क) सीधी बुवाई : गोविन्द,
(ख) रोपाई :  अश्वनी
(ब) सिंचित दशा
शीघ्र पकने वाली (१००-१२० दिन)  गोविन्द
मध्यम अवधि में पकने वाली (१२० -१४० दिन) पन्त धान-४, 
देर से पकने वाली (१४० दिन से अधिक):  मंसूरी,
(स) सुगन्धित धान:  टा-३, पूसा बासमती-१, हरियाणा बासमत

 . उत्तरी पूर्वी  मैदानी क्षेत्र (गोंडा, बहराइच, बस्ती, देवरिया, गोरखपुर, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, कुशीनगर, बलरामपुर,श्रावस्ती, संतकबीरनगर)

(अ) असिंचित दशा 
शीघ्र पकने वाली 
(क) सीधी बुवाई : नरेंद्र-९७ , नरेंद्र-११८, गोविन्द, बरानी दीप
(ख) रोपाई : नरेंद्र-११८, गोविन्द, नरेंद्र-९७
(ब) सिंचित दशा  
शीघ्र पकने वाली (१००-१२० दिन): रतना, आई. आर-50, नरेन्द्र- ११८, ,नरेन्द्र-९७, आई.आर.-३६, नरेन्द्र-८०, पन्त धान-१२, आई. आर.५०
मध्यम अवधि में पकने वाली (१२० -१४० दिन): सरयू -५२, सीता, पन्त धान-४, नरेन्द्र-३५९
देर से पकने वाली (१४० दिन से अधिक): एनडीआर -८००२, टा.-२३, मंसूरी
(स) सुगन्धित धान:  टा.-३, पूसा बासमती-१, बासमती-३७०
(द) ऊसरीली: सी. एस. आर.-१३ उसर धान-१, सी.एस.आर.-१०
(य) निचले जल भराव वाले क्षेत्र: ३० सेमी.- मंसूरी, ३०-५० सेमी.- जल लहरी, ५०-१०० सेमी.-एनडीआर -८००२
एक मीटर से अधिक (गहरा पानी)-  चकिया ५९, मधुकर, जलप्रिया
बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों के लिए- जल निधि, जलमग्न, मधुकर, बाढ़ अवरोधी 

८. पूर्वी मैदानी क्षेत्र (बाराबंकी, फ़ैजाबाद, सुल्तानपुर,प्रतापगढ़,जौनपुर, आजमगढ़,बलिया, गाजीपुर,वाराणसी, चंदौली, मऊ, अम्बेडकरनगर, संतरविदासनगर)  

(अ) असिंचित दशा 
शीघ्र पकने वाली 
(क) सीधी बुवाई : नरेंद्र-९७ , नरेंद्र-११८, गोविन्द, बरानी दीप
(ख) रोपाई : नरेंद्र-११८, गोविन्द, नरेंद्र-९७
(ब) सिंचित दशा  
शीघ्र पकने वाली (१००-१२० दिन): रतना, आई. आर-50, नरेन्द्र-  ८०, नरेन्द्र १८८  ,नरेन्द्र-९७,  पन्त धान-१२, आई. आर.५०
मध्यम अवधि में पकने वाली (१२० -१४० दिन): सरयू -५२, सीता, पन्त धान-४, नरेन्द्र-३५९
देर से पकने वाली (१४० दिन से अधिक):  टा.-२३, मंसूरी, स्वर्णा
(स) सुगन्धित धान:  टा.-३, पूसा बासमती-१, बासमती-३७०
(द) ऊसरीली: सी. एस. आर.-१३ उसर धान-१, सी.एस.आर.-१०
(य) निचले जल भराव वाले क्षेत्र: ३० सेमी.-मंसूरी सोना, ३०-५० सेमी.- मंसूरी, ५०-१०० सेमी.– मंसूरी, जल लहरी, एन. डी. आर.-८००२
एक मीटर से अधिक (गहरा पानी)–  चकिया ५९, मधुकर, जलप्रिया
बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों के लिए- जल निधि, जलमग्न, मधुकर, बाढ़ अवरोधी

 ९. विन्ध्य क्षेत्र (मिर्जापुर, इलाहाबाद, सोनभद्र, चंदौली के पठारी भाग)

(अ) असिंचित दशा 
शीघ्र पकने वाली 
(क) सीधी बुवाई : नरेंद्र-९७ , नरेंद्र-११८, गोविन्द, बरानी दीप
(ख) रोपाई : नरेंद्र-११८, गोविन्द, अश्वनी, नरेंद्र-९७
(ब) सिंचित दशा:  
शीघ्र पकने वाली (१००-१२० दिन): रतना, आई. आर-50, नरेन्द्र-  ८०, नरेन्द्र १८८  ,नरेन्द्र-९७,  पन्त धान-१२, आई. आर.५०
मध्यम अवधि में पकने वाली (१२० -१४० दिन): सरयू -५२, सीता, पन्त धान-४, नरेन्द्र-३५९
देर से पकने वाली (१४० दिन से अधिक):  टा.-२३, मंसूरी, स्वर्णा
(स) सुगन्धित धान:  टा.-३, पूसा बासमती-१, बासमती-३७०
(द) ऊसरीली: उसर धान-१ , नरेन्द्र ऊसर धान-२, सी.एस.आर.-१०
(य) निचले जल भराव वाले क्षेत्र (३० सेमी.) मंसूरी

 

 

गर्मी की जुताई करने के बाद २-३ जुताइयां करके खेत की तैयारी करनी चाहिये। साथ ही खेत की मजबूत मेड़बन्‍दी भी कर देनी चाहिए ताकि खेत में वर्षा का पानी अधिक समय तक संचित किया जा सके। अगर हरी खाद के रूप में ढैचा / सनई ली जा रही है तो इसकी बुवाई के साथ ही फास्‍फोरस का प्रयोग भी कर लिया जाय। धान की बुवाई / रोपाई के लिए एक सप्ताह पूर्व खेत की सिचाई कर दे, जिससे की खरपतवार उग आवे, इसके पश्चात बुवाई / रोपाई के समय खेत में पानी भर कर जुताई कर दे।

 शुद्घ एवं प्रमाणित बीज

प्रमाणित बीज से उत्पाद अधिक मिलता है और कृषक अपनी उत्पाद (संकर प्रजातियों द्दोडकर) को ही अगले बीज के रूप में सावधानी से प्रयोग कर सकते है। तीसरे वर्ष पुनः प्रमाणित बीज लेकर बुवाई की जाये। 

बीज शोधन

नर्सरी डालने से पूर्व बीज शोधन अवश्य करे लें। इसके लिए जहां पर जीवाणु झुलसा या जीवाणुधारी रोग की समस्या हो वहॉ पर २५ किग्रा. बीज के लिए ४ ग्राम स्ट्रेप्टोसाक्लीन या ४० ग्राम प्लान्टोमाइसीन को मिलाकर पानी में रात भर भिगो दे। दूसरे दिन द्दाया में सुखाकर नर्सरी डाले। यदि शाकाणु झुलसा की समस्या क्षेत्रों में नही है तो २५ किग्रा. बीज को रातभर पानी में भिगोने के बाद दूसरे दिन निकालकर कर अतिरिक्त पानी निकल जाने  के बाद ७५ ग्राम थीरम या ५० ग्राम कार्बेन्डाजिम को ८-१० लीटर पानी में घोलकर बीज मे मिला दिया जायें। इसके बाद द्दाया में अकुरित करके नर्सरी में डाले जायें। बीज शोधन हेतु बायोपेस्टीसाइड का प्रयोग किया जायें।

नर्सरी

एक हेक्टर क्षेत्रफल की रोपाई के लिए महीन धान का ३० किग्रा०, मध्यम धान का ३५ किग्रा० और मोटे धान क ४० किग्रा० बीज पौध तैयार करने हेतु पर्याप्त होता है। ऊसर भूमि में यह मात्रा गुनी कर दी जाय। एक हेक्टर नर्सरी से लगभग १५ हेक्टर क्षेत्रफल की रोपाई होती है। समय नर्सरी में बीज डाले और नर्सरी में १०० किग्रा० नत्रजन तथा ५० किग्रा. फास्फोरस प्रति हेक्टर की से प्रयोग करें। ट्राइकोडर्मा का एक द्दिडकाव नर्सरी लगने के १० दिन के अन्दर कर देना चाहिये।

 आई के १०-१४ दिन बाद एक सुरक्षात्मक द्दिडकाव रोगो तथा कीटो के बचाव हेतु करे खैरा रोग के एक सुरक्षात्मक द्दिडकाव करना चाहियें। सफेद रोग के नियंत्रण हेतु ४ किलो फरेस सल्फेट का २० कार्बेन्डाजिम ५० प्रतिशत ई०सी० का प्रति हेक्टर की दर से द्दिडकाव करें। नर्सरी में लगने वाले कीटों से बचाव हेतु एक लीटर फेनिट्रोथियान ५० ई.सी. या १.२५ लीटर क्यूनालफास २५ ई.सी. ली० या १.५ लीटर कलोरपायरीफास २० ई.सी प्रति हेक्टर का द्दिडकावकरें। नर्सरी में पानी का क्रम बढने पर उसे निकाल कर पुनः पानी देना सुनिश्चित करे।

सीधी बुवाई

मैदानी क्षेत्रो में सीधी बुवाई की दशा में ९० में ११० दिन में पकने वाली प्रजातियों को चुनने हुए। बुंवाई मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह कर देना चाहिये। ४० से ५० किग्रा प्रति हेक्अर की दर से २० सेमी० की दूरी पर लाइनो बोना चाहियें। पंक्तियों बुवाई करने से यात्रिक विधि से खरपतवार नियंत्रण में सुविधा होती है। तथा पौध सुरक्षा उपचार भी सुगमता पूर्वक किये जा सकते है। इस विधि से बुवाई करने पर पौधों की संख्या भी सुनिश्चित की जा सकती है।
यदि लेव लगाकर धान की बुवाई करनी हो तो १०० से ११० किग्रा. बीज प्रति हे. की दर से प्रयोग करें। बीज को २४ घण्टे पानी में भिगोकर ३६-४८ घण्टे तक ढेर बनाकर रखना चाहियें। जिससे बीज में अंकुरण प्रारम्भ हो जाय। इस अंकुरित बीज को खेम में लेव लगाकर दो सेमी. पानी मे द्दिडकाव बोया जाना चाहियें। आगरा मण्डल में जहॉ कुओं का पानी खारा है। और धान की पौध अच्द्दी प्रकार तैयार नही हो सकती है। इस विधि के अपनाना ज्यादा अच्द्दा है।

उचित गहराई व दूरी पर रोपाई

बौनी प्रजातियां की पौध की रोपाई ३-४ सेमी० से अधिक गहराई पर नही करना चाहियें। अन्यथा कल्ले कम निकलते है। और उपज कम हो जाती है। साधारण उर्वरा भूमि में पंक्तियों पौधो की दूरी २० १० सेमी उर्वरा भूमि मे २० १५ सेमी रखें एक स्थान पर २-३ पौध चाहिये। यदि रोपाई में देर हो जाय तो एक स्थान पर ३-४ पौध लगाना उचित होगा। साथ ही पौध से पंक्तियो की दूरी ५ सेमी कम कर देनी चाहिये। इस बात पर विशेष ध्यान दे कि प्रति वर्ग क्षे० मे सामान्य स्थिति में ५० हिल अवश्य होना चाहियें। ऊसर तथा देर से रोपाई की स्थिति ६५-७० हिल होनी चाहियें।

 धान की रोपाई मे पैडी ट्रान्सप्लान्टर का प्रयोग

पैडी ट्रान्सप्लान्टर द्दः लाइन वाली हस्तचालित तथा शक्ति चालित आठ लाइन वाल धान की रोपाई की मशीन है इस यन्त्र से रोपाई हेतु मैट टाइप नर्सरी की आवश्यकता होती है। इस नर्सरी मे धान का अंकुरित बीज प्रयोग किया जाता है। इस मशीन द्वारा कतार से कतार की दूरी २० सेमी निश्चित है अतः २०-१० सेमी की दूरी पर रोपाई हेतु ५० किग्रा. प्रति हे. बीज की आवश्यकता होती है। अच्द्दा अंकुरण ३० डिग्री सेंटीग्रट तापक्रम पर प्राप्त होता है। धान को पानी में २४ धन्टे भिगोने के पश्चात द्दाया मे या बोरे में दो या दो तीन दिन अथवा ठीक होने तक ढंक कर रखना चाहियें। बोरे पर अंकुर निकलने के समय तक पानी द्दिडकाव रहे। अंकुर फूटने पर बीज नर्सरी में बोने के लिए तैयार समझना चाहिये।

मैट टाइप नर्सरी उगना 

धान की नर्सरी उगाने के लिए ५-६ सेमी गहराई तक की खेत की ऊपर सतह की मिट्‌टी एकत्र कर लेते है। इसे बारीक कूटकर द्दलने से द्दान लेते है। जिस क्षेत्र में नर्सरी डालनी है उसमें अच्द्दी प्रकार पडलिंग करके पाटा कर दे। तत्पश्चात खेत का पानी निकाल दें। और एक या दो दिन तक ऐसे ही रहने दे। जिससे सतह पर पतली पर्त बन जाय अब इस क्षेत्र पर एक मीटर चौडाई में आवश्यकतानुसार लम्बाई तक लकड़ी की पटि्‌टया लगाकर मिट्‌टी की २ से ३ सेमी. ऊची मेड बनायें और इस क्षेत्र में नर्सरी हेतु तैयार की गई द्दनी हुई मिट्‌टी के एक सेमी ऊचाई तक बिद्दाकर समतल कर दें। तथा इसके ऊपर अंकुरित बीज ८०० से १००० ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से द्दिडक दे। अब इसके ऊपर थोड़ी द्दनी हुई मिट्‌टी इस प्रकार डाले कि बीज ढंक जाये। तत्पश्चात नर्सरी को पुआल घास के ढंक दे। ४-५ दिन तक पानी का द्दिडकाव करते रहे नर्सरी में किसी प्रकार के उर्वरक का प्रयोग न करें।

रोपाई

१५ दिन की पौध रोपाई करने हेतु स्क्रपर की सहायता से (२०-५० सेमी के टुकडों में ) पौध इस प्रकार निकाली जाय। ताकि द्दनी हुई मिट्‌टी की मोटाई तक का हिस्सा उठकर आये। इन टुकडों को पैडी ट्रान्सप्लान्टर की ट्रे में रख दें। मशीन में लगे हत्थें को जमीन की ओर हल्के झटके के साथ दबायें। ऐसा करने से ट्रे में रखी पौध की स्लाइस ६ पिकर काटकर ६ स्थानों पर खेत में लगा दें। फिर हत्थे को अपनी ओर खींच कर पीद्दे की ओर कदम बढाकर मशीन को उतना खेीचे जितना पौघ से पौध की सामान्यतः १० सेमी) रखना चाहते है। पुनः हत्थे को जमीन की ओर हल्के झटके से दबायें। इस प्रकार की पुनराक्षित करते जायें। इससे पौध की रोपाई का कार्य पूर्ण होता जायेगा।

गैप फिलिंग

रोपाई के बाद जो पौधे मर जायें उनके स्थान पर दूसरे पौधों को तुरन्त लगा दें। ताकि प्रति इकाई पौधों की संख्या कम न होने पावें। अच्दी उपज के प्रति वर्ग मीटर २५० से ३०० बालियां अवश्य होनी चाहियें।
६.१० निराई एवं खरपतवार नियंत्रण धान की खरपतवार नष्ट करने के लिए खुरपी या पैडीवीडर का प्रयोग करे। यह कार्य खरपतवार विनाशक रसायनों द्वारा भी किया जा सकता है। रोपाई वाले धान में घास जाति एवं चौडी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु ब्यूटाक्लोंर ५ प्रतिशत ग्रेन्यूल ३० से ४० किग्रा. प्रति वर्ग हे० अथवा बेन्थियोकार्ब १० प्रतिशत गेन्यूल १५ किग्रा. या बेन्थिायोकार्ब (५० ई.सी.) ३ लीटर या पेण्डी मैथालीन (३० ई.सी.) ३.३ लीटर या एनिलोफास ३० ई.सी. १.६५ लीटर हे. का रोपाई ३-४ दिन के अन्दर प्रयोग करना चाहिये। ब्यूटाक्लोर का प्रयोग ३-४ सेमी. पानी में किया जाय तथा एवं बेन्थियोकार्ब का प्रयोग अच्द्दी नमी की स्थिति में ही करना उचित होगा। केवल चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु २-४-डी सोडियम साल्ट का ६२५ ग्राम प्रति हे. की दर से प्रयोग किया जा सकता है। इसका प्रयोग धान की रोपाई के एक सप्ताह बाद और सीधी बुवाई के २० दिन बाद करना चाहियें।
रसायनों द्वारा खरपतवार की रोकथाम के लिए यह अति आवश्यक है कि दानेदार रसायनों का प्रयोग करते समय खेत मे ४-५ सेमी पानी भरा होना चाहियें। लूक्लोरोलिन का प्रयोग २.० ली. हे. रोपाई के पूर्व करना चाहिये।

उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना उपयुक्त है। यदि किसी कारणवश मृदा का परीक्षण न हुआ तो उर्वरको का प्रयोग निम्न प्रकार किया जाय:

स्थिति : सिंचित दशा में रोपाई

अधिक उपज देने वाली प्रजातियॉ
उर्वरक की मात्रा कि./हे.
 
नत्रजन
फास्फोरस
पोटाश
 
 (क) शीघ्र पकने वाली
१२०
६०
६०
 
 (ख) मध्यम देर से पकने वाली
१५०
६०
६०
 
 (ग) सुगन्ध धान बौनी
१२०
६०
६०
 
प्रयोग विधि: नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के पूर्व तथा नत्रजन की र्शेष मात्रा बराबर बराबर दो बार में कल्ले फूटते समय तथा बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था का प्रयोग करें।
देशी प्रजातियॉ
 
 
(क) शीघ्र पकने वाली
६०
३०
३०
 
(ख) मध्यम देर से पकने वाली
६०
३०
३०
 
(ग) सुगन्ध धान बौनी
६०
३०
३०
 
प्रयोग विधि: नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के पूर्व तथा नत्रजन की शेष मात्रा को बराबर बराबर दो बार में कल्ले फूटते समय तथा बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था पर प्रयोग करे। दाना बनने के बाद उर्वरक का प्रयोग न करें।
सीधी बुवाई
 
 
 
 
अधिक उपजदायी प्रजातियां
 १००-१२०
 ५०-६०
 ५०-६०
 
देशी प्रजातियां
६०
३०
३०
 
प्रयोग विधि: नत्रजन की एक चौथाई भाग तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूर्ण मात्रा कूड में बीज के नीचे डाले शेष नत्रजन का दो चौथाई भाग कल्ले फूटते समय तथा शेष एक चौथाई भाग बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था पर प्रयोग करें।

प्रयोग विधि: सम्पूर्ण उर्वरक बुवाई के समय बीज के नीचे कूडो में प्रयोग करे। 
नोट- लगातार धान-गेहू वाले क्षेत्रों में गेहूं धान की फसल के बीच हरी खाद का प्रयोग करे अथवा धान की फसल में १०-१२ टन/हे. गोबर की खाद का प्रयोग करे।

 जायद में मूंग की खेती करने से धान की फसल में १५ किग्रा. नत्रजन की बचत होता है। इसी प्रकार हरी खाद (सनई अथवा ढैचा) से लगभग ४०-६० किग्रा. नत्रजन की बचत होती है। अतः इस दशा में में नत्रजन उर्वरक तद्‌नुसार प्रयोग करे। यदि कम्पोस्ट १०-१२ टन का प्रयोग किया जाय तो उससे भी तत्व प्राप्त होते है  तथा मृदा का भौतिक सुधार होता है।

 ऊसरीली क्षेत्र में हरी खाद के लियें ढैचे की बुवाई करना विशेष रूप से लाभप्रद होता है। २ कुन्तल प्रति हेक्टर जिप्सम का प्रयोग का प्रयोग बेसल के रूप में किया जा सकता है। इससे धान की फसल को गन्धक की आवश्यकता पूरी हो जायेगी। सिंगल सुपर फास्फेट के प्रयोग से भी गन्धक की कमी दूर की जा सकती है। पोटाश का प्रयोग बेसल ड्रेसिंग मे किया जाय किन्तु हल्की दोमट भूमि में पोटाश उर्वरक को यूरिया के साथ टॉपड्रेसिंग में प्रयोग किया जाना उचित रहता है।
अतः ऐसी भूमि में रोपाई के समय पोटाश की आघी मात्रा का प्रयोग करना चाहिये और शेष आधी मात्रा को दो बार में नत्रजन के साथ टाप ड्रेसिंग करना चाहिये। जिन स्थानों में धान के खेतो मे पानी रूकता हो और उसके निकास की सुविधा न हो रोपाई के समय ही सारा उर्वरक देना उचित होगा। यदि किसी कारणवश यह सम्भव न हो तो ऐसे क्षेत्रों में यूरिया के २-३ प्रतिशत घोल का द्दिडकाव दो बार कल्ला निकलते समय तथा बाली निकलते की प्रारम्भिक अवस्था पर करना लाभदायक होगा। यूरिया की टाप-ड्रेसिंग के पूर्व खेत से पानी निकाल देना चाहियें और यदि किसी क्षेत्र में यह सम्भव न हो तो यूरिया को उसकी दुगुनी मिट्‌टी में एक चौथाई गोबर की खाद मिलाकर २४ घन्टे तक रख देना चाहिये। ऐसा करने से यूरिया अमोनियम कार्बेनेट के रूप् में बदल दी जाती है। ओर रिसाव द्वारा नष्ट नही होता है।

 प्रदेश में सिचाई क्षमता के उपलब्ध होते हुए भी धान का लगभग ६०-६२ प्रतिशत क्षेत्र ही सिचित है, जबकि धान की फसल को खाद्यान्न फसलों मे सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है। फसल को कुद्द विशेष अवस्थाओं में रोपाई के बाद एक सप्ताह तक कल्ले फूटने, बाली निकलने फूल खिलने तथा दाना भरते समय खेत में पानी बना रहना चाहिए।फूल खिलने की अवस्था पानी के लिए अति संवेदनशील है। परीक्षणो के आधार पर यह पाया गया है कि धान की अधिक उपज लेने के लिए लगातार पानी भरा रहना आवश्यक नहीं है इसके लिए खेत की सतह से पानी अदृश्य होने को एक दिन बाद ५ से ७ सेमी० सिचाई करना उपयुक्त होता है। खेत में पानी रहने से फास्फोरस लोहा तथा मैग्नीज तत्वों की उपलबधता बढ़ जाती है और खरपतवार भी कम उगतें है। यह भी धान देने योग्य है कि कल्ले होता है। अतः जिन क्षेत्रों निकलते है। समय ५० से०मी० से अधिक पानी अधिक समय तक धान के खेत में भरा होता है। करना बहुत हानिकारक होता है। जिन प्रकोप है। अन्यथा उत्पादन पर कुप्रभाव पडेगा। सिंचित दशा में खेत निरन्तर पानी भरा रहना बहुत आवश्यक यदि खेत से अदृश्य होने की स्थिति में एक दिन बाद ५ से ७ सेमी० तक पानी भर दिया जाय इससे सिचाई क ेजल मे भी बचत होगी। 

मुख्य रोग
उपरहार असिचिंत परिस्थिति
गहरे पानी वाली परिस्थिति 
सफेद रोग (नर्सरी में)
भूरा धब्बा
जीवाणु झुलसा
जीवाणु झुलसा
शीथ झुलसा
जीवाणु धारी
शीथ झुलसा
झोका
शीथ झुलसा
भूरा धब्बा
खैरा
 
जीवाणु धारी
 
 
झोका
 
 
खैरा
 
 

 सफेद रोग :

पहचान :
यह रोग लौह तत्व की अनुपलब्धता के द्वारा नर्सरी में अधिक लगात है। नई पत्ती सफेद रंग की निकलेगी जो कागज के समान पडकर फट जाती है।
उपचार :
इसके उपचार के लिए प्रति हेक्टर ५ किग्रा० फेरस सल्फेट को २० किग्रा० यूरिया अथवा २.५० किग्रा० बुझे हुए चने को ८०० लीटर/हेक्टर पानी के साथ मिलाकर २-३ द्दिडकाव दिन के अन्तर पर करना चाहिये।

 पत्तियों का भूरा धब्बा :

पहचान :
पत्तियों पर गहरे कत्थाई रंग के गोल अथवा अण्डाकार धब्बे पड़ जाते है। जिसका बीच का हिस्सा कुद्द पीलापन लिए हुए कत्थई रंग का होता है। इन धब्बो के चारो तरफ पीला सा घेराव बन जाता है। जो इस रांग का विशेष लक्षण है।
उपचार : 
1. बोने से पूर्व ३ ग्राम थीरम अथवा ४ ग्राम ट्राइकोडमा बिरिडी प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर लेना चाहियें।
2. खड़ी फसल पर जिंक मैगनीज कार्बामेट या जीरम ८० प्रतिशत का दो किलो अथवा जीरम २७ ई.सी. ३ ली० प्रति हे. की दर से द्दिडकाव करना चाहिये। अथवा
3. खड़ी फसल पर थायोफेनेट मिथाइल १.५ किग्रा. प्रति हे. की दर द्दिडकाव करना चाहिये।

जीवाणु झुलसा :

पहचान :
इसमे पत्तियों नोंक अथवा किनारे से एकदम सूखने लगती है। सूखे हुए किनारो अनियिमित एंव टेढे मेढे होते है।
उपचार : 
1. बोने से पूर्व बीजोपचार उपयुक्त विधि से करे।
2. रोग के लक्षण दिखाई देते ही यथा सम्भव खेत का पानी निकालकर १५ ग्राम स्ट्रप्टोसाएक्लीन व कॉपर आक्सीक्लोराइड का ५०० ग्राम प्रति हेक्टर की दर से द्दिडकाव करना चाहिये।
3. रोग लक्षण दिखाई देने पर नत्रजन की टापड्रेसिंग यदि बाकी है तो उसे रोक देना चाहिये।

शीथ झुलसा :

पहचान :
पत्र कंचुल पर अनियमित आकार के धब्बे बनते है। जिनका किनारा गहरा भूरा तथा बीच का भाग हल्के रंग का होता है। पत्तियों पर घेरेदार धब्बे बनते है।
उपचार : 
खड़ी फसल पर १.५ किग्रा थायोफिनेट मिथाइल या १ किग्रा० कार्बेन्डाजिम का प्रति हेक्टर की दर से ८०० लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार १० दिन के अंतर पर द्दिडकाव करना चाहियें

जीवाणु धारी रोग :

पहचान :
पत्तियों पर कत्थाई रंग की लम्बी लम्बी धारियां नसो के बीच में पड जाती है।
उपचार : 
झुलसा की भांति उपचार करे।

 झोंका रोग :

पहचान :
पत्तियों पर आंख की आकृति के धब्बे बनते है। जो बीच में राख के रंग के तथा किनारों पर गहरे कत्थाई रंग के होते है। इनके अतिरिक्त बालियों डंठलों पुष्प शाखाओं एवं गाठो पर काले भूरे धब्बे बनते है।
उपचार : 
1. बोने के पूर्व बीजो को २.३ ग्रीम थीरम या १.२ ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करे।
2. खड़ी फसल पर निम्न में से किसी एक रसायन का द्दिडकाव करना चाहिये।
3. कार्बेन्डाजिम १ किग्रा. प्रति हेक्टर की दर से २-३ द्दिडकाव १०-१२ दिन के अंतराल पर करे।

 खैरा रोग :

पहचान :
यह रोग जस्ते की कमी के कारण होता है। इसमें पत्तियॉ पीली पड जाती है। जिस पर बाद मे कत्थाई रंग के धब्बे पड जाते है।
उपचार : 
फसल पर ५ किग्रा. जिंक सल्फेट को २० किग्रा. यूरिया अथवा २.५ बुझे हुए चूने के ८०० लीटर पानी के साथ मिलाकर प्रति हेक्टर द्दिडकाव करना चाहियें।

 धान की फसल में एकीकृत रोग प्रबन्ध:

धान के प्रमुख रोगो के प्रभावी प्रबन्ध लिये निम्न उपाये अपनायें जा सकते है।

1.   गर्मी में गहरी जुताई एवं मेडो तथा खेत के आसपास के क्षेत्र को खरपतवार से यथा सम्भव मुक्त रखना चाहिये। (सभी बीमारियों)
2.   समय पर रोग प्रतिरोध/सहिष्णु प्रजातियां के मानक बीजो की बुवाई करनी चाहिये। (सेमी बीमारियों)
3.   बीज शोधन नर्सरी डालने से पहले क्षेत्र विशेष की समयानुसार बीजशोधन अवश्य कर लेना चाहिये। 
अ.   जीवाणु झुलसा की समस्या वाले क्षेत्रों में २५ क्रि०गा्र० बीज के लिए ३८ ग्राम ई.एम.सी. तथा ४ ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन को ४५ लीटर पानी में रात भर भिगो दे। दूसरे दिन द्दाया में सुखाकर नर्सरी डाले।
ब.   अन्य क्षेत्रों में बीज को ३ ग्राम थाइरम/किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिये।
स.   तराई एवं पहाड़ी क्षेत्रो मे बीज को ३ ग्रा. थाइरस १.५ ग्रा० /कार्बेन्डाजिम १.५ मिश्रण से किलो बीज को उपचारित करना चाहिये।
4.   नर्सरी, सीधी बुवाई अथवा रोपाई के बाद खैर रोग के लिए एक सुरक्षात्मक द्दिडकाव ५ कि०ग्र० जिक सल्फेट को २० किग्र्रा. यूरिया १००० ली० पानी में साथ मिलाकर प्रति हेक्टर की दर से हते बाद द्दिडकाव करना चाहिये।
5.   रोगो के लक्षण दिखते ही नत्रजन की शेष टापड्रेसिंग रोककर रोग सहायेक परिस्थितियों के समाप्त होने के पर करना चहियें उर्वरकों को संतुलित प्रयोग कई रोगो की वृद्घि रोगो की को रोकता है। सफेद रोग के नियंत्रण हेतु आवश्यकता पडने पर ५ किग्रा० फेरस सल्फेट की २० किग्रा० यूरिया के साथ ८०० लीटर पानी में घोल कर द्दिडकाव करना चाहिये।
6.   बड़े क्षेत्र में महामारी से वचने के लिए एकाधिक प्रजातियों को लगाना चाहिए।
7.   भूमि शोधन २.५ किग्रा. / हे.  + फ्य्म 70 – 80 से करें यदि  भूमि शोधन रसायन  से नहीं हुआ है तो

 उपरहार असिंचित परिस्थिति में :

दीमक :

दीमक के श्रमिक ही हानिकारक होते है। ये जड़ एवं तने को खाकर सुखा देते है। प्रकोपित सूखे पौधे को आसानी से उखाड़ा जा सकता है। उखाड़ने पर पौधे के साथ मिट्‌टी तथा गंदले सफेद पंखहीन ६-८ सेमी० लम्बे श्रमिक दिखाई पड़ सकते है।
प्रबंधन 
फसल बोने/रोपाई से पूर्व 
ऐसे क्षेत्रों मे कच्चे गोबर की खाद का प्रयोग न करें ।
फसल के अवशेष को नष्ट करें ।
प्रकोप होने पर 
सिचाई के पानी के साथ गामा बी.एच.सी. २० ई.सी. ३.७५ लीटर या क्लोरपाइरीफास २० ई. सी. २-३ लीटर प्रति हे. की दर से प्रयोग करें।

पत्ती लपेटक कीट :

संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करे।प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण करे।दो कीट ग्रसित ताजी पत्ती/हिल देखने पर इन्डोसल्फान ३४ ई.सी. या क्यूनालफास २५ ई.सी. १.२५ लीटर/हे. की दर से द्दिडकाव करें।

गन्धी बग :

प्रबन्धन 
द्दिटपुट रोपाई/बुवाई जहॉ तक सम्भव हो न करे। खेत को खरपतवार मुक्त रखें।
फूल आने के बाद औसतन २-३ कीट/हिल दिखाई पडने पर मैलाथियान ५ प्रतिशत फेन्थोएट २ प्रतिशत फेनवेलरेट ०.४ या प्रतिशत या लिन्डेन १.३ प्रतिशत धूल २०-२५ किग्रा. प्रति हे. की दर से प्रातः अथवा सांयकाल हवा कम होने पर बुरकाव करना चाहिये।

बाल काटने वाला कीट : (सैनिक कीट)

 इस कीट की भी सूडियां ही हानिकारक होती है। ये सूडियॉ दिन में किल्लों/दरारों में छुपी रहती है। प्रारम्भ में ये पत्तियों को खाती है। परन्तु धान के पकने के समय सायं काल पौधों पर चढ़कर बालो से २-३ या कई धान वाले टुकड़े काट कर जमीन में गिरा देती है। ये गंदे भूरे पीले अथवा गहरा तथा भूरा सिर वाली होती है। इसके ऊपरी सतह पर एक गहरी भूरे रंग की पट्‌टी तथा दोनो बगल में दो रंग की पट्‌टी पायी जाती है।
 प्रबन्धन 

  • शीघ्र तथा मध्यम देर से पकने वाली प्रजातियों का चयन करे।
  • रोपाई जुलाई के प्रथम सप्ताह तक अवश्य कर दें।
  • वैसिलस थ्यूरिन्जिंसिस ०.५-१.०० किग्रा/हे० की दर से द्दिडकाव करे।
  • ४-५ सूंडी प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में दिखाई पडने पर क्लोरपाईरीफास २० ई सी ५ लीटर क्यूनालफास २५ ई सी १.५ लीटर इण्डोसल्फान ३५ ई सी १.२५ डाईक्लोरोफास ७६ ई सी ०.५ लीटर फेन्थोएट २डी या इण्डोसल्फान ४डी क्यूनालफास १.५ डी २५-३० किग्रा प्रति हेक्टर की दर से द्दिडकाव/बुरकाव करे।
  • प्रकोप की स्थिति में परिपक्वता पर शीघ्र कटाई की संस्तुति की जाती ह

सिंचित परिस्थिति में 

गोभ गिडार :

प्रौढ़ मक्खी धूसर भूरे रंग वाली तथा सूडियाँ पादहीन पीले रंग की होती है। सूडियों गोभ बना रही पत्तियों के किनारों को खाती है। ये पत्तियां निकलने पर किनारे से कटी दिखाई देती है।
प्रबन्धन 

  • पानी का निकास करें।
  • २० प्रतिशत से अधिक प्रकोपित पत्तियां दिखाई पड़ने पर कार्बोयूरान ३ जी किग्रा./हे. या मोनोक्रोटोफास ३६ ई०सी० १.० ली./हे. की दर से द्दिडकाव करे।

तना बेधक :

 इस कीट की सूडियॉ ही हानिकारक होती है। पूर्ण विकसित सूंडी हल्के पीले शरीर वाली नारंगी पीले सिर वाली होती है। मादा पतंगे के पंख पीले होते है। तथा अगले दोनो पंखों के मध्य एक काला धब्बा होता है। इसके उदर के अंतिम सिरे पर पीले भूरे रंग के बालों का गुच्द्दा होता है। मादा द्वारा अण्डे पत्तियों के अगले भाग की ऊपरी सतह पर झुण्ड में दिये जाते है। इसके आक्रमण के फलस्वरूप फसल की वानस्पतिक अवस्था में मृत गोभ तथा बाद में प्रकोप होने पर सफेद बाली बनती है।
प्रबन्धन 

  • गर्मी की जुताई करें।
  • रोपाई के पूर्व पौधे की ऊपरी पत्तियों को काट दे।
  • तना बेधक कीट के प्रकोप का पूर्वानुमान हेतु ५ फैरेमोन ट्रेप/हे. की दर से लगाया जाए।
  • महसूरी, साकेत-४ रत्ना, तथा आई आर-३६ प्रजातियों को इस कीट से कम हानि होती है।
  • संस्तुत उर्वरको की मात्रा का ही प्रयोग करे।
  • ५ : ३० – ७ : ०० (सुबह) पंतंगों को पकड़ कर मार दे।
  • अण्डे जो पत्तियों के ऊपरी भाग पर पाये जाते हैं खोज कर नष्ट करे।
  • कीट के प्राकृतिक शत्रु ट्राइकोगामा जैपोनिकम को २.५ कार्ड (२०.००० अण्डे प्रति कार्ड) प्रति हेक्टर की दर से रोपाई के ३० दिनों बाद (सप्ताह के अन्तराल पर) ६ बार द्दोड़े।
  • ५ प्रतिशत मृत गोभ अथवा एक अन्डे का झुण्ड वानस्पतिक अवस्था में तथा एक पंतगा/वर्ग मी० बाल निकलने की अवस्था में दिखाई पडने पर कारटाप हाईड्रोक्लोराइड ४ प्रतिशत दानेदार रसायन के १७-१८ किलोग्राम/हे. की दर से प्रयोग विशेष लाभकारी है। जो एक सुरक्षित रसायन भी है।
  • कटाई जमीन से सटाकर करे। 

पत्ती लपेटक कीट :

 पहचान एंव नियंत्रण हेतु असिंचित परिस्थिति में वर्णित उल्लेख का अवलोकन करे। 

हरा फुदका :

 प्रौढ़ हरे रंग के होते है। पंखों के अंन्तिम भाग पर काले रंग का धब्बा होता है। इनके शिशु तथा प्रौढ़ दोनो पत्तियों से रस चूसकर हानि पहुंचाते है। ग्रसित पत्ती पहले पीली पड़ती है। फिर कत्थाई रंग की होकर नोंक से नीचे की तरफ सूखती है। ये फुदके टुगरू वायरस के वाहक भी है।
प्रबन्धन

  • खेत को खरपतवार मुक्त रखे।
  • संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करे।
  • कल्ले बनते समय १० कीट तथा बाल आने पर १०- २० कीट/हिल दिखाई देने पर
  • मोनोक्रोटोफास ३६ ई.सी. १ लीटर की दर से द्दिडकाव करे।
  • वी.टी ०.५ – १.०० किग्रा/हे० की दर से आवश्यक पानी में घोलकर द्दिडकाव करें।
  • १.५ लीटरर नीम ऑयल/हे० की दर से प्रयोग करे।
  • ब्यूवेरिया बैसिअना का प्रयोग करें

भूरा फुदका :

इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनो पौधों के किल्लों के बीच रहकर तने के निचले भाग तथा पत्ती आवरण (पर्ण कचुंकी) से रस चूसते रहते है। आवश्यकता से अधिक चूसा हुआ रस निकलने के कारण पत्तियों पर काला कवक उग आता है। जो प्रकाश संश्लेषण में बाधक होता है। वानस्पतिक अवस्था में इसके प्रकोप के फलस्वरूप गोलाई में पौधों द्दोटे रह जाते है। तथा सूख जाते है। इसे हापरनवर्न कहते है। बाद मे प्रकोप होने पर पौधे गिर जाते है तथा धान में चावल नही बनते है। यह कीट ग्रासी स्टन्ट वायरस का वाहक भी होता है। इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ कत्थाई रंग के पंख वाले अथवा बिना पंख के होते 
है।
प्रबन्धन 

  • खेत में खरपतवार मुक्त रखे।
  • द्दिटपुट रोपाई न करे।
  • ३०-३५ दिनों बाद से १० दिनों के अंतर पर पानी देना तथा निकालना लाभदायक होते है।
  • खाद की संस्तुत मात्रा का प्रयोग करें। विशेषकर अधिक नत्रजन का प्रयोग न करे।
  • १.५ लीटर नीम ऑयल/हे० की दर से द्दिडकाव करे।
  • १० कीट प्रति होने पर फोरेट १० जी, १० किलोग्राम या कारटाप हायड्रोक्लोराइड का प्रयोग ३-५ सेमी. पानी भरे खेत में।
  • इन्थोफेनप्राक्स २० ई.सी. १ मिली/ली. अथवा डाईक्लोरोवास १मिली. तथा वी. पी. एम. सी. १मिली. के मिश्रण को प्रति लीटर पानी में घोलकर आवश्यक मात्रा द्दिडकाव करें। यह अण्डो को हैचिंग के समय नष्ट करने के साथ साथ वयस्क कीट को भी नष्ट करता है।

सफेद  पीठ वाला फुदका :

प्रौढ़ काले से भूरे रंग के तथा पीले शरीर वाले होते है। इनके पंखों के जोड पर सफेद पट्‌टी होती है। पंख द्दोटे या लम्बे होते है। शिशु सफेद रंग के पंखहीन होते है। इनके उदर पर सफेद तथा काले धब्बे पायें जाते है। इनके शिशु तथा प्रौढ़ दोनो कल्लो के मध्य रहकर रस चूसते है जिसके फलस्वरूप पौधे पीले हो जाते है। तथा सूख जाते है। अधिक चूसा हुआ रस निकलने के कारण पत्तियॉ पर काला कवक उग आता है।
प्रबन्धन 
भूरे फूदाके की भाँति ।

हिस्पा :

 इस कीट का प्रौढ़ द्दोटा चमकीले काले रंग का होता है। जिसके शरीर में काटें होते है। जो पत्तियों की हरियाली को खुरचकर खाते है। जिसके कारण पत्तियों पर सफेद समान्तर रेखायें बन जाती है। कीट की गिडार पत्तियों में सुरंग बनाकर हानि पहुंचाती है।
प्रबन्धन

  • रोपाइ के पूर्व पत्तियों के ऊपरी भाग को कतर दें
  • खेत को खरपतवार मुक्त रखे।
  • २ प्रौढ़ या दो ग्रसित पत्तिया/हिल दिखाई देने पर इण्डोसल्फान ३५ ई.सी. १.० लीटर क्यूनालफास २५ ई.सी. १.२५ लीटर/हे. की दर ेसे द्दिडकाव करे।
  • कीट नाशकों के साथ २ प्रतिशत की दर से यूरिया मिलाकर द्दिडकाव अधिक लाभप्रद होता है।

 बंका कीट :

प्रौढ़ कीट सफेद पंखवाला होता है। पंखों पर टेढ़ी-मेढ़ी लकीरे पाई जाती है। सूडियां हल्के हरे रंग की तथा भूरे सिर वाली होती है। ये पत्तियॉ से चिपककर उन्के हरे भाग को खुरचकर खाती है। अधिक प्रकोप होने पर उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है।
प्रबन्धन

  • खेत के दोनो सिरों पर रस्सी पकड़कर पौधों के ऊपर से तेजी से ले जाने से वे हिल जाते है। तथा सूडिया पानी में गिर जाती है। इस पानी को निकाल देने से इनकी संख्या काफी कम हो जाती है।
  • क्यूनालफास २५ ई.सी. १.२५ ली. या इन्डोसल्फान ३५ ई.सी. १ ली. का द्दिडकाव प्रति हे० की दर से 2 पत्तियां/हिल ग्रसित होने पर करे।

 

नरई कीट (गालमिज) :

 प्रौढ़ कीट मच्द्दर के आकार को होता है। मादा का उदर चमकीले पीले लाल रंग का होता है। हानि सूंडी द्वारा होती है। इसके प्रकोप के फलस्वरूप बाल न बनकर प्याज के पत्ती के आकार की रचना बन जाती है। जिसे सिल्वर शूट या ओनियन शूट कहते है।
प्रबंधन

  • रोपाई १५ जुलाई से पहले करे।
  • खेत को खरपतवार मुक्त रखे।
  • अवरोधी प्रजाति बोये ।
  • संतुलित उर्वरको का प्रयोग करे।
  • ५ प्रतिशत कल्ले प्रभावित होने पर कार्बोयूरान ३ जी २० किग्रा०/हे. की दर से प्रयोग करे।

गन्धी कीट :

पहचान एवं नियंत्रण हेतु उपरहार असिचिंत परिस्थिति में वर्णित उल्लेख का अवलोकन करें।

बाल काटने वाला कीट :

उपरहार असिंचित परिस्थिति की भाँति।

कम गहरे पानी वाली परिस्थिति में 

तना बेधक : 

पहचान 
सिंचित परिस्थिति के अनुसार।
प्रबंधन 

  • धान की जल प्रिया प्रजाति उगाये।
  • रोपाई/बुवाई के ३० दिन के बाद ६ हफ़्तों तक ५०.००० ट्राइकोग्रामा प्रति सप्ताह द्दोड़े।
  • ५ प्रतिशत मृत गोभ या सफेद बाल दिखाई पडने पर ०.५-१.०० किग्रा. वी.टी./हे. की दर से द्दिडकाव करे।

पत्ती लपेटक कीट :

पहचान एवं प्रबन्ध सिंचित परिस्थिति के अनुसार। 

हिस्पा :

पहचान एवं प्रबन्ध सिंचित परिस्थिति के अनुसार। 

अधिक गहरे पानी वाली परिस्थिति 

तना बेधक : 

पहचान 

सिंचित परिस्थति के अनुसार

प्रबंधन 

  • धान के तना द्देदक कीट के प्रकोप का पूर्वानुमान ५ फेरोमोन ट्रैप/हे० की दर से लगाकर करे।
  • धान की मक्का/ज्वार के साथ ८० और २० के अनुपात में मिलवां खेती में तना बेधक का प्रकोप कम हो जाता है।
  • बुवाई के ६० दिनो बाद २.५ कार्ड (२०.००० अण्डे प्रति कार्ड) ५०.००० ट्राइाकेग्रामा प्रति सप्ताह द्दोडे ।

पत्ती लपेटक कीट :

पहचान एवं प्रबन्ध सिंचित परिस्थिति के अनुसार।

हिस्पा: 

पहचान एंव प्रबन्ध सिंचित परिस्थिति के अनुसार।

बाढ़ ग्रस्त परिस्थिति में

तना बेधक :

पहचान

सिचित परिस्थिति के अनुसार।

 प्रबंधन 

  • बाढ अवरोधी प्रजाति का चयन करे।
  • रोपाई के ३० दिन बाद ६ सप्ताह द्दोड़ो। वी.टी. ०.५-१.०० किग्रा. प्रति हे० की दर से आवश्यक पानी में घोलकर द्दिडकाव करे।

 

एकीकृत कीट प्रबन्ध :

  • गर्मी की जुताई तथा मेढ़ो की द्दटाई (ग्रास हापर, बाल काटने वाला कीट तथा अन्य पत्ती खाने वाले कीट)
  • खेत को खरपरतवार मुक्त रखे (हरा, सफेद फुदका एवं गन्धी कीट)
  • अगेती एंव समय से रोपाई/बुवाई (गाल मिज/बाल काटने वाला कीट)
  • प्रत्येक २० कतार के बाद एक कतार द्दोडकर रोपाई करे। (भूरा फुदका तथा बाल काटने वाला कीट एवं गालमिज)
  • अधिक दूरी पर (२०ग२० सेमी. ) रोपाई करे। (भूरा तथा सफेद फुदका)
  • संस्तुत उर्वरक का प्रयोग करें। (तना वेधक पत्ती लपेटक कीट, सफेद तथा भूरा फुदका गाल मिज)
  • उचित जल प्रबन्ध (गोभ गिडार भूरा तथा सफेद फुदका) ।
  • २.५ ग्रा. ट्राईकोडर्मा /हे. की दर से कम्पोस्ट के साथ मिलकर मृदा का उपचार करें।
  • कीट रोधी प्रजाति को उगायें।
  • फसल के अवशेष नष्ट करें। (दीमक तथा तना बेधक)
  • पौध को रोपने के पूर्व फनगी को कतर दें । (तना बेधक तथा हिस्पा)
  • एक रस्सी के दो सिरे पकडकर फसल के ऊपर से तेजी से गुजारना तथा जल निकास करना । (पत्ती लपेट तथा बंका कीट)
  • १.५ ली. हे. नीम आधारित कीटनाशक का प्रयोग करें
  • प्राकृतिक शत्रुओं को प्रोत्साहन दे।
  • जैविक नियंत्रण हेतु बायोएजेण्ट का प्रयोग करना।
  • आर्थिक क्षति स्तर पर उपयुक्त कीटनाशक का प्रयोग।

 

धान की फसल में महावार महत्वपूर्ण कार्य बिन्दु – नर्सरी डालना :

मई

१ पंत-४ सरजू-५२ आई.आर.-३६ नरेन्द्र ३५९ आदि।
२ धान के बीज शोधन बीज को १२ घन्टे पानी मे भिगोकर तथा सुखाकर नर्सरी में बोना।

जून

१ धान की नर्सरी डालना। सुगन्धित प्रजातियां शीघ्र पकने वाली।
२ नर्सरी में खैरा रोग लगने पर जिंक सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव सफेदा रोग हेतु फेरस सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव
३ धान की रोपाई
४ रोपाई के समय संस्तुत उर्वरक का प्रयोग एवं रोपाई के एक सप्ताह के अंदर ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण

जुलाई 

१ धान की रोपाई प्रत्येक वर्गमीटर मे ५० हिल तथा प्रत्येक हिल पर २-३ पौधे लगाना एवं ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण
२ ऊसर क्षेत्र हेतु ऊसर धान-१ जया साकेत-४ की रोपाई ३५-४० दिन की पौध लगाना। पंक्ति से पंक्ति की दूरी १५ सेमी व पौधे से पौधे की दूरी १० सेमी. एवं एक स्थान पर ४-५ पौध लगाना।

अगस्त 

१ धान में खैरा रोग नियंत्रण हेतु ५ किग्रा. जिंक सल्फेट तथा २० किग्रा. यूरिया अथवा २.५ किग्रा. बुझा चूना को ८०० लीटर पानी।
२ धान में फुदका की रोकथाम हेतु मोनोक्रोटोफास ३५ ई.सी. एक ली. अथवा इंडोसल्फान ३५ ई.सी. १.५ लीटर ८०० लीटर घोलकर प्रति हे. द्दिडकाव।

 सितम्बार 

१ धान में फूल खिलने पर सिंचाई
२ धान में दुग्धावस्था में सिचाई।
३ धान में भूरा एवं झौका रोग की रोकथाम हेतु जिंक मैगनीज कार्बामेंट अथवा जीरम ८० के २ किग्रा. अथवा जीरम २७ प्रतिशत के ३० ली० अथवा कार्बन्डाजिम १ ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोलकर तैयार कर द्दिडकाव करना चाहिये।
४ धान में पत्तियों एवं पौधो के फुदके नियंत्रण हेतु मोनोक्रोटोफास १ लीटर का ८०० लीटर पानी में घोलकर प्रति हे. द्दिडकाव करे।
५ धान मे लेग लीफ अवस्था पर नत्रजन की टाप डे्रसिंग।
६ गन्धी कीट नियंत्रण हेतु ५ प्रतिशत में मैलाथियान चूर्ण २५ से ३० किग्रा. प्रति हे. की या लिन्डेन १.३ प्रतिशत धूल २० से २५ किग्रा./हे. का बुरकाव करे।

 अक्टूबर

१ धान में सैनिक कीट नियंत्रण हेतु मिथाइल पैराथियान २ प्रतिशत चूर्ण अथवा फेन्थोएट का २ प्रतिशत चूर्ण २५-३० किग्रा. किग्रा/हे. बुरकाव करे।
२ धान में गंधी कीट नियंत्रण हेतु मैलाथियान ५ प्रतिशत चूर्ण के २५-३० कि. ग्रा. प्रति हे. या लिन्डेन १.३ प्रतिशत धूल धूल २०-२५ किग्रा. प्रति हे. बुरकाव करे।

Source: IITK portal

 

 

 

 

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