अन्नदाता की बेबसी: हर साल क्यों दोहराई जाती है गेहूं और चने की खरीद की त्रासदी?

भारत में कृषि को अर्थव्यवस्था की ‘रीढ़’ कहा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि फसल उगाने वाला ‘अन्नदाता’ अपनी उपज बेचने के लिए हर साल दर-दर भटकने को मजबूर है। सरकारें बदलती हैं, चुनाव आते हैं और किसान कल्याण के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।

वर्तमान स्थिति: आंकड़ों की जुबानी

हाल के सरकारी खरीद सत्रों में जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं:

  • कर्ज का बोझ: मध्य प्रदेश में खरीद में देरी और गिरती कीमतों के कारण लगभग 6.2 लाख किसान कर्ज के जाल में फंस गए हैं।
  • एमएसपी बनाम बाजार भाव: गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹2,625 प्रति क्विंटल (₹40 बोनस सहित) तय किया गया है, लेकिन खरीद केंद्रों पर देरी के कारण किसान अपनी फसल व्यापारियों को ₹2,000 से ₹2,200 के भाव पर बेचने को मजबूर हैं।
  • चने और दालों की स्थिति: ‘पीएम-आशा’ (PM-AASHA) और ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ के तहत 100% खरीद के वादे के बावजूद, धरातल पर क्रियान्वयन बहुत सुस्त है। खरीफ 2024-25 में तुअर की खरीद अपने लक्ष्य का 2% से भी कम रही है।

हर साल आने वाली समस्याओं के मुख्य कारण (Root Causes)

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये समस्याएं हर साल क्यों आती हैं? इसके पीछे कुछ गहरे ढांचागत कारण हैं:

  1. लॉजिस्टिक्स और समन्वय की कमी: हरदा जैसे जिलों में खरीद के पहले ही दिन वेयरहाउस प्रबंधन और सहकारी समितियों के बीच तुलाई की जगह को लेकर विवाद सामने आए, जिससे खरीद प्रक्रिया ठप हो गई।
  2. बारदाने (Gunny Bags) की कमी: सरकारों द्वारा समय पर बोरियों का इंतजाम न कर पाना खरीद में देरी का एक बड़ा कारण बनता है।
  3. खरीद केंद्रों की देरी: फसल कटाई के हफ्तों बाद खरीद शुरू होती है। किसान को अगली फसल की बुवाई या घरेलू खर्च (शादी-ब्याह आदि) के लिए तुरंत नकद चाहिए होता है, इसलिए वह एमएसपी का इंतजार करने के बजाय कम दाम पर फसल बेच देता है।
  4. नमी और गुणवत्ता का बहाना: अक्सर खरीद केंद्रों और व्यापारियों द्वारा ‘नमी’ (Moisture content) का हवाला देकर किसानों को कम दाम दिए जाते हैं।

कर्ज का अंतहीन चक्र

सरकारी खरीद में देरी किसानों के लिए केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि यह एक वित्तीय संकट है। कई सहकारी बैंकों के नियम हैं कि यदि पिछला कर्ज मार्च तक नहीं चुकाया गया, तो 0% ब्याज की सुविधा खत्म हो जाती है और ब्याज दर सीधे 12% तक पहुंच जाती है। जब सरकार फसल नहीं खरीदती, तो किसान समय पर कर्ज नहीं चुका पाता और डिफाल्टर हो जाता है।

चुनावी वादे बनाम जमीनी हकीकत

चुनाव के समय राजनेता किसानों के लिए ‘बोनस’ और ‘एमएसपी’ की घोषणाएं तो करते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही इन वादों को फाइलों में दबा दिया जाता है। खरीद केंद्रों पर किसानों के लिए मूलभूत सुविधाओं (जैसे पीने का पानी या बैठने की जगह) का अभाव रहता है। इसके अलावा, किसानों को खराब गुणवत्ता वाले बीज और नकली कीटनाशकों की समस्या का भी सामना करना पड़ता है, जो उनकी पूरी मेहनत पर पानी फेर देते हैं।

निष्कर्ष

भारत का किसान आज केवल खेती नहीं कर रहा, बल्कि वह व्यवस्था की विफलता से लड़ रहा है। डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन और एग्रीस्टैक (AgriStack) जैसी योजनाएं भविष्य के लिए उम्मीद जगाती हैं, लेकिन जब तक खरीद प्रक्रिया में जमीनी सुधार, समय पर भुगतान और पर्याप्त भंडारण की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक किसान का कल्याण केवल चुनावी भाषणों तक सीमित रहेगा।

समय आ गया है कि सरकारें ‘किसान कल्याण’ को कागजों से निकालकर मंडियों की हकीकत तक पहुंचाएं।
Content By AI Reasearch

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