धान के प्रमुख रोग: पहचान और बचाव
1. जीवाणु झुलसा या जीवाणुधारी झुलसा (Bacterial Leaf Blight)
- पहचान: यह रोग धान की फसल को मुख्य रूप से दो अवस्थाओं में प्रभावित करता है—करेसेक (सीडलिंग विल्ट) और पर्ण झुलसा। करेसेक अवस्था रोपाई के 1 से 3 सप्ताह बाद दिखाई देती है, जिसमें पत्तियां मुरझाकर ग्रे-हरे से पीले रंग की हो जाती हैं और पूरा पौधा सूख जाता है। पर्ण झुलसा चरण में पत्तियों के किनारों या ऊपरी सिरे से लहरदार पीली धारियां बननी शुरू होती हैं। सुबह के समय इन घावों पर दूधिया या ओस की बूंद जैसा जीवाणु स्राव (bacterial ooze) दिखाई देता है।
- करेसेक और तना छेदक में अंतर: तना छेदक के नुकसान और करेसेक में अंतर करने के लिए संक्रमित पौधे के निचले सिरे को उंगलियों से दबाएं; यदि यह करेसेक है, तो कटे सिरे से पीले रंग का जीवाणु रस बाहर निकलेगा।
- बचाव व प्रबंधन:
- बीज उपचार: बीजों को 12 घंटे तक 0.25% एग्रीमाइसीन और 0.05% सेरेसान के घोल में भिगोएं, फिर 30 मिनट के लिए 52–54°C गर्म पानी में उपचारित करें। इसके अलावा, स्यूडोमोनास फ्लोरेसेन्स (10 ग्राम/किग्रा बीज) से भी बीज उपचारित कर सकते हैं।
- सांस्कृतिक उपाय: रोग-प्रतिरोधी किस्में जैसे IR 20, IR 72, PONMANI, TKM 6 उगाएं। खेत में नाइट्रोजन (यूरिया) का अत्यधिक उपयोग न करें और बीमारी दिखने पर टाप ड्रेसिंग टालें।
- जैविक व रासायनिक छिड़काव: शुरुआती लक्षण दिखने पर ताजे गाय के गोबर का अर्क (20 ग्राम प्रति लीटर पानी) या 3% नीम तेल का छिड़काव करें। गंभीर स्थिति में स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट + टेट्रासाइक्लिन संयोजन (300 ग्राम) + कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (1.25 किग्रा) प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
2. झौंका रोग (Blast Disease)
- पहचान: यह एक फफूंदजनित रोग है जो पौधे के पत्तियों, नोड्स और बालियों की गर्दन (neck) पर हमला करता है। पत्तियों पर आंख या नाव के आकार के धब्बे बनते हैं, जिनके किनारे भूरे-लाल और बीच का हिस्सा राख के रंग का होता है। जब इसका संक्रमण बाली की गर्दन पर होता है (गले का सड़ना/Neck Blast), तो गर्दन काली होकर सिकुड़ जाती है और बाली टूटकर लटक जाती है, जिससे दाने नहीं भर पाते।
- बचाव व प्रबंधन:
- नर्सरी में हमेशा नमी बनाए रखें और उसे सूखने न दें।
- बीजों को ट्राइसाइक्लाज़ोल या कार्बेन्डाजिम (2.0 ग्राम/किग्रा बीज) से उपचारित करें।
- खेत में रोग दिखने पर ट्राइसाइक्लाज़ोल (1 ग्राम/लीटर) या कार्बेन्डाजिम (1.0 ग्राम/लीटर) या प्रोपिकोनाजोल का छिड़काव करें।
3. भूरा धब्बा रोग (Brown Spot)

- पहचान: पत्तियों और दानों पर गहरे भूरे या कत्थई रंग के गोल या अंडाकार धब्बे बनते हैं, जो तिल के बीज जैसे दिखते हैं। इन धब्बों के चारों ओर पीला घेरा होता है। यह रोग बीजों की गुणवत्ता और वजन को बहुत कम कर देता है।
- बचाव व प्रबंधन:
- रोगमुक्त बीजों और प्रतिरोधी किस्मों (जैसे भवानी, CO 44, धनु) का उपयोग करें।
- बीज को थीरम या कैप्टान (2 ग्राम/किग्रा) से उपचारित करें।
- खड़ी फसल में मैनकोज़ेब (2.0 ग्राम/लीटर) या एडिफेनफॉस (1 मिली/लीटर) का 10–15 दिनों के अंतराल पर 2 से 3 बार छिड़काव करें।
4. शीथ झुलसा या शीथ ब्लाइट (Sheath Blight)
- पहचान: यह रोग मुख्य खेत में कल्ले बनने की अंतिम अवस्था में पानी की सतह के पास पत्ती के आवरण (sheath) पर दिखाई देता है। इस पर अनियमित हरे-भूरे रंग के धब्बे बनते हैं, जिनका केंद्र बाद में भूरा-सफेद हो जाता है और किनारे बैंगनी-भूरे रंग के हो जाते हैं। अनुकूल मौसम में यह संक्रमण ऊपर की पत्तियों तक फैलकर पूरे पौधे को सुखा देता है।
- बचाव व प्रबंधन:
- रोपाई से पहले मिट्टी में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेन्स (2.5 किग्रा/हेक्टेयर को 50 किग्रा गोबर की खाद/बालू में मिलाकर) डालें।
- खड़ी फसल में रोग दिखने पर कार्बेन्डाजिम (1 ग्राम/लीटर) या प्रोपिकोनाजोल (1 मिली/लीटर) या वैलिडामाइसिन का पर्णीय छिड़काव करें।
5. मिथ्या कंडुआ (False Smut / कोयला रोग)
- पहचान: यह रोग केवल बालियों में दानों पर दिखाई देता है। प्रभावित दाने बड़े, मखमल जैसे चिकने पीले-नारंगी पिंडों (smut balls) में बदल जाते हैं, जो बाद में पीले-हरे या हरे-काले हो जाते हैं।
- बचाव व प्रबंधन:
- फसल में नाइट्रोजन (यूरिया) के अत्यधिक प्रयोग से बचें।
- गोभ (boot leaf) और दूधिया अवस्था (milky stage) में प्रोपिकोनाजोल (1.0 मिली/लीटर) या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (2.5 ग्राम/लीटर) का छिड़काव करें।
6. खैरा रोग (Khaira Disease)
- पहचान: यह रोग मिट्टी में जिंक की कमी के कारण होता है। इसमें पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और उन पर कत्थई (bronze) रंग के धब्बे बनने लगते हैं।
- बचाव व प्रबंधन:
- रोपाई या बुआई से पहले आखिरी जुताई के समय मिट्टी में जिंक सल्फेट (20-25 किग्रा/हेक्टेयर) मिलाएं।
- यदि खड़ी फसल में लक्षण दिखाई दें, तो जिंक सल्फेट (33% मोनो जिंक @ 5 किग्रा या 21% जिंक @ 8-10 किग्रा) + 20 किग्रा यूरिया प्रति हेक्टेयर (या बुझे हुए चूने के साथ) मिलाकर 1000 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें।
धान के प्रमुख कीट: पहचान और बचाव
1. तना छेदक (Stem Borer)
- पहचान: इस कीट की सुंडी तने के अंदर घुसकर अंदरूनी हिस्से को खाती है, जिससे वैस्कुलर सिस्टम कट जाता है। फूल आने से पहले इसके कारण गोभ सूख जाती है जिसे “डेड हार्ट” (Dead Heart) कहते हैं और फूल आने के बाद बालियां सफेद और खाली रह जाती हैं जिसे “व्हाइट हेड” (White Head) कहा जाता है।
- बचाव व प्रबंधन:
- रोपाई से पहले नर्सरी के पौधों से तना छेदक के अंडों के समूहों (egg masses) को हाथ से हटा दें।
- खेत में जैविक नियंत्रण के लिए परजीवी ट्राइकोग्रामा जैपोनिकम (Trichogramma japonicum) कार्ड छोड़ें।
- रासायनिक नियंत्रण: यूरिया के साथ मिलाकर दानेदार कीटनाशक फार्टेरा (Chlorantraniliprole 0.4% GR) @ 4 किलोग्राम प्रति एकड़ या रीजेंट (Fipronil 0.3% GR) @ 4 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से खेत में डालें। खड़ी फसल में कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड (4% GR) @ 7 से 7.5 किग्रा प्रति एकड़ भी यूरिया के साथ दिया जा सकता है।
2. भूरा फुदका (Brown Planthopper – BPH)
- पहचान: यह कीट धान के तने के निचले हिस्से में पानी की सतह के पास सफेद झाग जैसा दिखता है और पौधों का रस चूसता है। इसके अत्यधिक प्रकोप से फसल अचानक सूखकर गोल घेरे में गिरने लगती है, जिसे “हॉपर बर्न” (Hopper Burn) कहते हैं।
- बचाव व प्रबंधन: इस कीट के प्रभावी नियंत्रण के लिए बुपरोफेज़िन 15% + एसिपेट 35% WP (Founder) @ 400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।
3. पत्ता लपेटक (Leaf Folder)
- पहचान: इसकी सुंडी पत्तियों को गोल मोड़कर (फोल्ड करके) अंदर से हरे हिस्से को खाती है, जिससे पत्तियों पर सफेद रंग की लंबी धारियां दिखाई देती हैं।
- बचाव व प्रबंधन: खेत में बांस की फट्टी फेरकर सुंडियों को गिराया जा सकता है। रासायनिक नियंत्रण के लिए कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड या एमामेक्टिन बेंजोएट का छिड़काव करें।
4. जड़ों का लाल कीड़ा (Red Worms)
- पहचान: ये कीड़े धान की जड़ों में लगकर रस चूसते हैं जिससे पौधों में पीलापन आ जाता है और फुटाव रुक जाता है।
- बचाव व प्रबंधन: इसके निवारण के लिए यूरिया के साथ फार्टेरा (4 किग्रा/एकड़) या रीजेंट (4 किग्रा/एकड़) मिट्टी में मिलाएं। आपातकालीन स्थिति में क्लोरपायरीफॉस + साइपरमेथ्रिन (400-500 मिली/एकड़) का स्प्रे जड़ों के पास करें।
प्राकृतिक खेती में कीट व रोग प्रबंधन (Natural Farming IPM)
यदि आप पूरी तरह से प्राकृतिक या जैविक तरीके से खेती कर रहे हैं, तो देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से बने इन पारंपरिक कीटनाशकों का उपयोग कर सकते हैं:
- नीमास्त्र (Neemastra): गोमूत्र, गाय का गोबर और नीम की पत्तियों से तैयार घोल रस चूसने वाले कीटों, माहू, सफेद मक्खी और तना छेदक के लिए बहुत असरदार है। (5 लीटर नीमास्त्र + 100 लीटर पानी प्रति एकड़ छिड़कें)।
- अग्निअस्त्र (Agnivastra): हरी मिर्च, लहसुन और गोमूत्र से बना यह तीखा कीटनाशक रस चूसने वाले कीटों और इल्लियों को नियंत्रित करता है।
- ब्रह्मास्त्र (Brahmastra): नीम, धतूरा, तुलसी और अरंडी जैसी कड़वी पत्तियों को गोमूत्र में उबालकर बनाया जाता है, जो तना छेदक और बड़े पतंगों को नष्ट करता है।
- जीवामृत (Jeevamrut): रोपाई के 10 दिनों बाद से हर 15 दिन में 200 लीटर जीवामृत प्रति एकड़ सिंचाई के पानी के साथ देने से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।



