मध्य प्रदेश के प्रमुख मूंग उत्पादक जिलों—नर्मदापुरम, हरदा, और गाडरवारा—से किसानों की बदहाली की बेहद चिंताजनक तस्वीरें सामने आ रही हैं।
खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत कर फसल उगाने वाला किसान आज मंडियों और सोसायटियों के बाहर अपनी ही उपज बेचने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है।
6 से 7 दिनों की लंबी लाइनें, फिर भी नहीं बिक रही फसल धरातल पर हालात यह हैं कि किसान अपनी मूंग बेचने के लिए पिछले 6 से 7 दिनों से लगातार कतारों में लगे हुए हैं। इतनी लंबी प्रतीक्षा के बावजूद उनकी मूंग की खरीदी नहीं हो पा रही है। दिन-रात कतारों में गुजारने के बाद भी किसानों को केवल निराशा ही हाथ लग रही है।
बारिश का मौसम और चोरी का डर वर्तमान में मानसून (बरसात) का सीजन सक्रिय है, जिससे खुले आसमान के नीचे ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में रखी मूंग के पानी में भीगकर खराब होने का खतरा लगातार बना हुआ है। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था लचर होने के कारण किसानों की चिंताएं दोगुनी हो गई हैं; हाल ही में रात के समय किसान की मूंग चोरी होने की शिकायत भी दर्ज कराई गई है।
MSP से ₹2000 कम दाम पर खरीदी: व्यापारियों की मनमानी मंडियों में बेबस किसानों की इस मजबूरी का फायदा निजी व्यापारी उठा रहे हैं। सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से बहुत नीचे जाकर व्यापारी किसानों से मूंग खरीद रहे हैं। जहां नियमों के तहत किसानों को उचित दाम मिलना चाहिए, वहीं वे ₹6000 से ₹6200 प्रति क्विंटल (जो MSP से ₹2000 से भी अधिक कम है) पर अपनी फसल बेचने को मजबूर हैं।
दोगुनी आय के दावों की खुली पोल एक तरफ सरकार जहां किसानों की आय दोगुनी करने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर किसान पूरी तरह बेहाल है। किसानों का आरोप है कि उन्हें न तो समय पर खाद और बीज मिल पा रहे हैं और न ही फसल का सही दाम मिल रहा है। ऐसे में किसानों के बीच यह धारणा बन रही है कि सरकार की नीतियां व्यापारियों को अनुचित फायदा पहुंचा रही हैं, जिसके कारण वे इतने कम दामों पर खुलकर खरीदी कर रहे हैं।
समाधान की मांग: MSP से नीचे खरीदी पर लगे कानूनी रोक इस संकट से उबरने के लिए किसानों का मानना है कि सरकार को तत्काल एक ऐसा कानून बनाना चाहिए जिसके तहत मंडियों में MSP से कम दाम पर खरीदी को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया जाए।
यदि ऐसा कानून बनता है, तो किसान अपनी फसल सुविधा अनुसार सोसाइटी या मंडी दोनों में से किसी भी जगह बेच सकेंगे। इससे सरकारी तंत्र पर भी ज्यादा बोझ नहीं आएगा और किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिल सकेगा।

