भोपाल: मध्यप्रदेश में खरीफ मौसम के दौरान उड़द की फसल मुख्य दलहनी फसलों में से एक मानी जाती है। दलहनी फसल होने के कारण उड़द अपनी जड़ों की ग्रंथियों द्वारा वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर भूमि की उर्वरता को बढ़ाती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सही समय पर बुआई के बाद की सही देखरेख और प्रबंधन अपनाकर किसान भाई उड़द की फसल से विपुल उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग मध्यप्रदेश के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रस्तुत है बुआई के बाद फसल प्रबंधन की विस्तृत रिपोर्ट:
उड़द में एकीकृत नाशी कीट प्रबंधन
उड़द भारत एवं मध्यप्रदेश की प्रमुख खरीफ दलहन फसल है। इसमें जड़ों की गांठों के कारण नत्रजन की कम आवश्यकता होती है, परंतु कीट प्रकोप से 17 से 38 प्रतिशत तक उपज हानि हो सकती है। अब तक उड़द में 15 प्रकार के कीटों द्वारा क्षति दर्ज की गई है।
1. प्रमुख कीट एवं क्षति का प्रकार:
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क्ली वीटिक (पिस्सू भृंग):
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लक्षण: प्रौढ़ धारीदार भूरे तथा भृंग (ग्रब) मटमैले सफेद होते हैं। प्रौढ़ रात में पत्तियों पर छेद करते हैं (200 से अधिक छेद प्रति पत्ती)। भूगर्भीय ग्रब जड़ों में छेद करके 25 से 60% तक गांठों को नष्ट कर देते हैं, जिससे नाइट्रोजन स्थिरीकरण प्रभावित होता है।
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पत्ती मोड़क कीट (इल्ली):
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लक्षण: हरे रंग की इल्लियां पत्तियों को मोड़कर या जाला बनाकर अंदर से क्लोरोफिल खाती हैं, जिससे पत्तियां पीली-सफेद पड़ जाती हैं।
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सफेद मक्खी:
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लक्षण: पत्तियों की निचली सतह से रस चूसती हैं और ‘पीला मौजेक’ (Yellow Mosaic) विषाणु फैलाती हैं। इससे 10 से 40% तक उपज हानि होती है।
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बिहार रोमिल इल्ली (कंबल कीट) व अन्य पत्ती भक्षक:
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लक्षण: छोटी इल्लियां समूह में पत्ती पर जाला बनाकर खाती हैं। बड़ी इल्लियों के शरीर पर घने बाल होते हैं जो पत्तियों को पूरी तरह खाकर केवल ढांचा छोड़ देती हैं।
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2. रासायनिक कीटनाशकों की मात्रा व छिड़काव सुझाव:
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सुरक्षा सुझाव: घोल में चिपचिपा पदार्थ (स्टीकर) मिलाएं। धूल/डस्ट का भुरकाव सुबह करें। कीटनाशक बदल-बदल कर उपयोग करें। घोल पहले अलग बर्तन में बनाएं, फिर स्प्रेयर टंकी में डालें।
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अनुशंसित कीटनाशक:
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इल्लियां (बिहार रोमिल, तम्बाकू, फली भेदक आदि): क्वीनालफास 2 मि.ली./लीटर (30 मि.ली./15 ली. टंकी, 500 ली./हेक्टेयर)।
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सफेद मक्खी व हरा फुदका: डाइमिथोएट 30 ई.सी. 2 मि.ली./लीटर (30 मि.ली./15 ली. टंकी, 500 ली./हेक्टेयर)।
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स्प्रेयर दर: नेपसेक (15 ली.) की 12 टंकी/एकड़ या पॉवर स्प्रेयर की 5 टंकी/एकड़। आवश्यकता होने पर 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें।
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दवा मात्रा सूत्र: दवा की मात्रा = (छिड़काव घोल की ताकत × छिड़काव घोल की मात्रा) / उपलब्ध दवा की ताकत
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उड़द में एकीकृत रोग प्रबंधन
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पीला चित्तेरी रोग: पत्तियों पर पीले धब्बे बनते हैं, बाद में पूरा पौधा पीला हो जाता है (100% तक हानि संभव)। यह सफेद मक्खी द्वारा फैलता है।
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पर्ण व्याकुंचन (झुर्रीदार पत्ती रोग): बीजाई के 4 सप्ताह बाद तीसरी पत्ती पर मरोड़ व झुर्रियां दिखती हैं। पुष्पक्रम गुच्छे जैसा बनता है।
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मौजेक मौटल (कुर्बरता): पत्तियां सिकुड़कर फफोलेदार हो जाती हैं। यह बीज जनित विषाणु है।
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पर्ण कुंचन: पत्तियों के किनारे नीचे की ओर मुड़ जाते हैं और झटका देने पर गिर जाते हैं। यह थ्रिप्स द्वारा फैलता है।
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सरकोस्पोरा पत्ती बुंदकी रोग: पत्तियों, तनों व फलियों पर गहरे भूरे-लाल धब्बे पड़ते हैं।
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श्याम वर्ण (एन्थ्रेकनोज): फफूंद जनित रोग, जिसमें वृत्ताकार गहरे भूरे/काले धब्बे बनते हैं।
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चारकोल (मैक्रोफोमिना) झुलसा: तने के आधार पर सफेद कैनकर व भूरी धारियां बनती हैं, पौधे बौने रह जाते हैं।
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चूर्णिता आसिता (Powdered Mildew): पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसा चूर्ण फैलता है।
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जड़ सड़न एवं पत्ती झुलसा (राइजोक्टोनिया): पत्तियों पर अनियमित भूरे धब्बे बनते हैं और जड़ें काली व लाल पड़कर सड़ जाती हैं।
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जीवाणु पत्ती झुलसा: पत्तियों की ऊपरी सतह पर भूरे सूखे धब्बे बनते हैं।
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गेरूआ (Rust): पत्तियों की निचली सतह पर लाल-भूरे उभार (पस्चूल) बनते हैं।
1. प्रतिरोधी किस्मों का चयन:
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पीला चित्तेरी रोग: पंत उर्द-19, पंत उर्द-30, पी.डी.एम.-1, यू.जी. 218, पी.एस.-1, नरेन्द्र उर्द-1, डब्ल्यू.बी.यू.-108, डी.पी.यू. 88-31, आई.पी.यू.-94-1।
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चूर्ण कवक: एल.बी.जी.-17, एल.बी.जी. 402।
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जीवाणु पर्ण बुंदकी: कृष्णा, एच. 30, यू.एस.-131।
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पर्ण व्याकुंचन: एस.डी.टी 3।
2. रासायनिक व जैविक रोग प्रबंधन:
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सफेद मक्खी/पीला मोजेक: डाइमेथोएट (2 मिली/लीटर) या मेटासिस्टाक्स 0.1% + सल्फेक्स 3 ग्राम/लीटर का 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।
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विषाणु रोग (मोजेक, पर्ण कुंचन): इमिडाक्लोप्रिड 5 ग्राम/किग्रा बीज दर से बीजोपचार तथा बुआई के 15 दिन बाद 0.25 मिली/लीटर छिड़काव।
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फफूंद जनित धब्बा रोग/झुलसा: कार्बेन्डाजिम/बेनलेट (2 मिली/लीटर) या मैंकोजेब 0.30% का छिड़काव।
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चूर्णी कवक: गंधक पाउडर 3 किग्रा/हेक्टेयर का भुरकाव।
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बीजोपचार: ट्राइकोडर्मा विरिडी 5 ग्राम/किग्रा बीज या स्ट्रेप्टोमाइसीन सल्फेट 500 PPM से उपचारित करें।
भंडारण के प्रमुख कीट एवं प्रबंधन
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प्रमुख कीट:
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दालों का घुन: ग्रब फलियों/दानों में छेद करके अंदर से खाता है और गोल छेद बनाकर बाहर निकलता है।
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खपरा बीटिल: जुलाई से अक्टूबर में ग्रब बीजों का भ्रूण भाग खाकर अंकुरण क्षमता नष्ट कर देता है।
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लाल सुरही: प्रौढ़ बीजों को काटकर आटे में बदल देते हैं।
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भंडारण प्रबंधन:
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पक्के व नमी-रोधी गोदाम का प्रयोग करें।
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नए बोरों का उपयोग करें या पुराने बोरों को 15 मिनट उबलते पानी में सुखाएं / 1% मैलाथियान घोल में 10 मिनट डुबोकर सुखाएं।
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दाल में 1 भाग दाल पर 3/4 भाग राख मिलाएं।
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दानों को कड़ी धूप में सुखाकर नमी 8-10% तक लाएं।
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बोरों को लकड़ी के पटरों (6-10 सेमी ऊंचे) पर दीवार से 50 सेमी (2-3 फीट) दूर रखें। ढेर की ऊंचाई 3 मीटर से अधिक न हो।
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पूसा बिन, पंतनगर कुठला या हापुड़ बिन का प्रयोग करें।
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