नर्मदापुरम, मध्यप्रदेश | विशेष संवाददाता
जिले में धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली को जलाने पर जिला प्रशासन द्वारा लगाया गया प्रतिबंध अब किसानों के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। छोटे और सीमांत किसान, जिनके पास पराली प्रबंधन के लिए संसाधन नहीं हैं, अब इस आदेश के कारण आर्थिक संकट में फंसते जा रहे हैं।
🔥 पहले प्रतिबंध, अब परेशानी
किसानों का कहना है कि प्रशासन ने बिना किसी पूर्व तैयारी के पराली जलाने पर रोक लगा दी, लेकिन न तो मशीनें दी गईं, न ही कोई सब्सिडी या वैकल्पिक उपाय।
“हमने फसल काट ली है, अब खेत खाली करने के लिए पराली हटाना जरूरी है, लेकिन खर्चा बहुत बढ़ गया है,” एक स्थानीय किसान ने बताया।
🚨 सैटेलाइट की गलती से निर्दोष किसानों पर जुर्माना

कई किसानों पर पराली जलाने का आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज की गई है, जबकि सैटेलाइट इमेजिंग में तकनीकी त्रुटियों के कारण गलत रिपोर्टिंग हुई।
“हमने पराली नहीं जलाई, लेकिन सैटेलाइट ने गलत दिखाया और हमें जुर्माना भरना पड़ा,” एक पीड़ित किसान ने कहा।
🗣️ विपक्ष का विरोध: “तुगलकी फरमान”
कांग्रेस नेता पुष्पराज पटेल ने इस आदेश का विरोध करते हुए इसे “तुगलकी फरमान” और “नमक कानून तोड़ो, पराली जलाओ” जैसा करार दिया। उन्होंने कहा कि यह आदेश किसानों को अपराधी बना रहा है, जबकि उन्हें सहयोग की ज़रूरत है।
🌱 पर्यावरण संरक्षण जरूरी, लेकिन किसानों को साथ लेकर
पराली जलाना वायु प्रदूषण का कारण बनता है, लेकिन इसका समाधान किसानों को दंडित करना नहीं है। विशेषज्ञों का सुझाव है:
- पराली प्रबंधन के लिए सरकारी सब्सिडी और मशीनें उपलब्ध कराई जाएं
- धान की एमएसपी को वास्तविक लागत और महंगाई के अनुसार बढ़ाया जाए
- जैविक खाद, बायोफ्यूल और कंपोस्टिंग को बढ़ावा दिया जाए
- सैटेलाइट रिपोर्टिंग में पारदर्शिता और सुधार हो
🤝 किसान और पर्यावरण दोनों की रक्षा करें
किसान पर्यावरण के दुश्मन नहीं हैं, बल्कि उसके रक्षक हैं। लेकिन उन्हें सहयोग, सम्मान और न्याय चाहिए।
सरकार को चाहिए कि वह सख्ती नहीं, समझदारी से काम ले।

